आज स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के राष्ट्रउत्कर्ष अभियान के अंतर्गत उनका सोनीपत आगमन हुआ।

आज स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के राष्ट्रउत्कर्ष अभियान के अंतर्गत उनका सोनीपत आगमन हुआ।

आज स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के राष्ट्रउत्कर्ष अभियान के अंतर्गत इंद्रप्रस्थ समाचार इंटरनेशनल की 2 पत्रिका मेरे द्वारा भेंट की गई।स्वामी जी ने आशीर्वाद स्वरूप पत्रिका में छपे स्वामी जी के जीवन परिचय एवं सोनीपत आगमन के समाचार को विस्तारपूर्वक पढा।स्वामी जी द्वारा प्राप्त आशीर्वाद से अभिभूत हूँ। - " डॉ. जी पी शाही कौशिक " 


 

सोनीपत।   श्री ऋगवेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवद्र्घनमठ पुरी पीठाधीश्वर श्रीमज्जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि विश्व का हृदय भारत है। उन्होंने कहा कि भारत में गंगा-यमुना के मध्य का क्षेत्र विशेष आस्था का केंद्र है। इसी प्रकार हरियाणा के कुरूक्षेत्र व पानीपत जिले ऐतिहासिक है, जिन्हें धरातल पर धर्म, ज्ञान और वीरता के लिए विश्व स्तर पर पहचान मिली है। शंकराचार्य निश्चलानंद महाराज रविवार को राष्ट्रोत्कर्ष अभियान यात्रा के अंतर्गत डीसीआरयूएसटी में आयोजित धर्मसभा को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अध्यात्म और राष्ट्रीयता का संदेश देते हुए श्रीमदभागवद गीता के अध्यायों का वर्णन करते हुए मनुष्य को इस दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन भोगने के लिए नहीं मिला अपितु अच्छे कर्म करते हुए भक्ति अथवा ज्ञान मार्ग के द्वारा स्वयं को ब्रह्म के रूप में जानने के लिए प्राप्त हुआ है।

 

जिसका जन्म हुआ है उसका मरण भी निश्चित है, किंतु हम मोक्ष प्राप्त कर इस चक्र से छुटकारा पा सकते है। इसके लिए मनुष्य को स्वयं को शरीर नहीं बल्कि खुद को आत्मस्वरूप में पहचानना चाहिए। सृष्टि परमात्मा में मन लगाने के लिए है। जब तक सृष्टा में मन समाहित नहीं होता तब तक जीव का कल्याण संभव नहीं। स्वामी निश्चलानंद ने ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने वालों का मुंह बंद करते हुए बताया कि विश्व में जल नहीं होता तो प्यास नहीं लगती, भोजन नहीं होता तो भूख नहीं लगती। इसी प्रकार मृत्यु न होती तो सच्चिदानंद नहीं होते जो नश्वरता से परे है। हर मानव नश्वरता और क्षणभंगुरता से ऊपर उठना चाहता है, जिसका केवलमात्र एक  ही उपाय है कि हम स्वयं को आत्मस्वरूप में पहचानें। अज्ञान को तत्व ज्ञान द्वारा जलाने की क्षमता अर्जित करने के लिए ही मानव जीवन मिला है।

उन्होंने कहा कि जीवन जिविका के लिए नहीं है बल्कि जिविका जीवन के लिए है और जीवन को सच्चिदानंद को समर्पित कर देना चाहिए। भगवान की सत्यता सिद्घ है। उन्होंने श्रीमदभगवदगीता के आधार पर मुक्ति की परिभाषा बताते हुए कहा कि बंधन किसी को भी पसंद नहीं है। स्वभाव से जीव ईश्वर की ओर ही जाएगा। शंकराचार्य ने कहा कि हम भगवान के अंश है। हमारी चाह का विषय भगवान है। मानव जीवन को सार्थक करने के लिए नियमित रूप से कम से कम डेढ़ घंटा भगवान का भजन करना चाहिए। जिस प्रकार एक बार किया हुआ भोजन कई घंटों तक प्राणशक्ति को मजबूती देता है उसी प्रकार ईश्वर की स्तुति से आत्मबल मिलता है। हम परमात्मा की ओर आगे बढऩे में सफल होते हैं।

उन्होंने अनेकों उदाहरणों के माध्यम से जीव-जीवात्मा और परमात्मा के भेद को समझाते हुए बताया कि आत्मा और परमात्मा एक ही है। जो जीव स्वयं को ब्रह्मïरूप में जान लेता है वह खुद को जीवन-मरण के चक्र से ऊपर ले जाता है। शंकराचार्य स्वामी निश्चलांद महाराज ने मोबाईल-रॉकेट-कंप्यूटर के युग में भी वेदादिशास्त्रों की प्रासंगिकता को गंभीरता से समझाया। उन्होंने कहा कि वेद शास्त्रों से ज्ञान-विज्ञान चुराया गया और अत्याधुनिक यंत्रों का सृजन किया गया। डिग्री-डिप्लोमा लेकर भी मानव को रहता है कि उसने कुछ नहीं जाना-समझा। सीधा अर्थ है आत्मज्ञान के बिना सब ज्ञान अधूरा है। वेद शास्त्रों के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसलिए इनकी उपयोगिता को समझना चाहिए।

उन्होंने गीता का सारांश देते हुए महाभारत काल के उदाहरण के साथ कहा कि वैज्ञानिक धरातल पर कत्र्तव्य का निर्णय एकांगी नहीं होता। यदि चीन-पाकिस्तान-बांगलादेश युद्घ के लिए भारत को तैयार करेंगे तो अहिंसा के नाम पर भारत मौन नहीं रहेगा। भगवान की प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि भव का त्याग करने पर ही भगवान मिलते हैं। भगवान को पाकर हम भव के अधिपति बन सकते हैं। फिर क्यों भव के चक्कर में फंसकर समय व्यर्थ करते हैं। उन्होंने आहार-विहार और खान-पान के संयम पर भी बल दिया। साथ ही उन्होंने विकास और राजनीति को जोड़ते हुए कहा कि विकास में मानवता, प्रकृति के प्रति दायित्व को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने विस्तार से अध्यात्म को समझाने का प्रयास करते हुए उपस्थित जनसमूह को आशीर्वाद दिया।